शनिवार, 9 मई 2020

कविता



हर इक मौसम को ख़बर है वर्ष में आने की

हर इक अंकुर को खबर है शजर में आने की




तुम थककर रुक ना जाना मंजिल के मुसाफिर

राहों को खबर है तुम्हारी मंजिल के आने की




अंधेरों को ना गुमां हो खुद पर खुद के होने का

सूर्य को खबर है अंधेरों में उजाले लाने की




यूं तो बैठे हैं कई ओहदों पर सत्ता के छत्र तले

पर कुछ को ही खबर है देश चलाने की




पक्षी चाहे जितना उड़ ले आकाश की ऊंचाई

उसको खबर है धरातल पर उतर आने की




हर इक काफ़िए को खबर है ग़ज़ल में आने की

हर इक सरिता को खबर है संगम के आने की




लहरें चाहे जितनी विपरीत हो लें समन्दर में

हर इक कश्ती को खबर है साहिल पे आने की




हर दिन हो रहे अपराध मानवता हो गई रुखसत

हर इक मानव को खबर दो मानवता में आने की




✍️Writer: shiv

























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शायरी : kavi shiv shilpi