बुधवार, 15 अप्रैल 2020

प्रेम गीत



जो मैं बन जाता झोंका हवा का अगर,
रोज छूता तुम्हे मैं शाम आे सहर।।

मैं उड़ा कर तुम्हे आसमानी डगर,

ले जाता कहीं सजर की डाल पर।।

सांसे बनकर उतरता तुम्हारे जिगर,

जो मै बन जाता झोंका हवा का अगर।।

भर के वाहों में तुमको मेरे हमसफ़र,

तुम्हारे अधरो पे करता अधर से सफर।।

 रोज मिलता मिलाता नजर से नजर,

जो मैं बन जाता झोंका हवा का अगर।।

✍️शिव शिल्पी

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शायरी : kavi shiv shilpi