सोमवार, 13 अप्रैल 2020

13 अप्रैल जलियांवाला बाग हत्याकांड पर रचना।

मै बाग हूं जलियांवाला,लिए हुए कण कण में ज्वाला।
जो रक्त गिरा मेरे दामन पर ,वो रक्त था वीरों वाला।।

जब चली गोलियां डायर की, वो दृश्य था हिंसा वाला।

आज भी गुंजित है धरा, वो दृश्य था चीखों  वाला।। 

यह निर्मम हत्याकांड बना ,स्वतंत्रता की चिंगारी वाला।

जो लहू गिरा मेरे दामन पर ,वो लहू था वीरों वाला।।

देख  भीषण क्रूर कृत्य , उठा लिया वक़्त ने  भाला।

बना यही वक़्त का भाला,स्वतंत्रता की चिंगारी वाला।।

मेरी धरा पर जो रक्त गिरा,वो है महाक्रांति की ज्वाला।

मैं बाग हूं जलियांवाला,लिए हुए कण कण में ज्वाला।।

✍️कवि: shiv Shilpi

कोई टिप्पणी नहीं:

शायरी : kavi shiv shilpi