बहरे मुतकारिब मुसद्दस सालीम।
वज्न :122 122 122
विधा :नज़्म
------------------------
कहां तुम चले जा रहे हो
यहां से नजर आ रहे हो
सही राह तुम भूलकर के
गलत राह तुम जा रहे हो
तमों का बसेरा वहां पर
जहां आज तुम जा रहे हो
मंजर भी हिंसक हैं जहां के
उसी राह तुम जा रहे हो
कमाई गई शोहरत जो
मिटाने उसे जा रहे हो
नशा लोभ लालच जहां पर
वहां तुम चले जा रहे हो
✍🏻शिव शिल्पी
वज्न :122 122 122
विधा :नज़्म
------------------------
कहां तुम चले जा रहे हो
यहां से नजर आ रहे हो
सही राह तुम भूलकर के
गलत राह तुम जा रहे हो
तमों का बसेरा वहां पर
जहां आज तुम जा रहे हो
मंजर भी हिंसक हैं जहां के
उसी राह तुम जा रहे हो
कमाई गई शोहरत जो
मिटाने उसे जा रहे हो
नशा लोभ लालच जहां पर
वहां तुम चले जा रहे हो
✍🏻शिव शिल्पी

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें